
कोरोना : मेरा संबल, मेरे राम
- esha poddar

- Aug 28, 2021
- 4 min read
आखिरकार कोरोना की बीमारी ने मुझे भी अपनी चपेट में ले ही लिया। यह दूसरी लहर वास्तव में अत्यंत प्रलयंकारी रूप से सामने आ रही है और लोगो को अपना शिकार बना रही है। जिस दिन मुझे बुखार के आरंभिक लक्षण दिखे, उसी दिन मैंने शाम को अपना कोरोना टेस्ट करा लिया। अगले दिन मुझे पॉजिटिव की रिपोर्ट प्राप्त हुयी। यह पॉजिटिव शब्द की सिहरन से मेरा पहला साक्षात्कार था। हे भगवान! मुझे भी कोरोना हो गया! आँखों के सामने यकायक अँधेरा सा छाने लगा। महामारी की सारी विभीषिका सामने से तैर गयी - अस्पतालों में बेड की मारामारी, ऑक्सीजन सिलिंडर की लाइनें और दवाओं तथा इंजेक्शन की भागदौड़। मैं अपनी रिपोर्ट हाथ में लिये हैरान, नि:सहाय सा यंत्र-जंत्रित खड़ा अपनी रिपोर्ट की सच्चाई से अपने को रूबरू कराने की कोशिश करने लगा।
फिर मैंने मन में विचार किया कि चलो अच्छा है कि आने वाले १४ दिन मैं सिर्फ स्वयं को दूँगा; कुछ पढूँगा, कुछ लिखूँगा, कुछ सुनूँगा और कुछ सुनाऊँगा। बुखार आने के दो-तीन दिन तक तो मैंने अपनी नित्यचर्या प्राणायाम और व्यायाम आदि के साथ बनाये रखी परन्तु फिर शरीर ने मेरा साथ देना छोड़ दिया और मैंने प्राणायाम और व्यायाम आदि सब कुछ छोड़ दिया। बुखार था कि १०३.५ से हिलने का नाम नहीं ले रहा था। पेरासिटामोल की दिन की छः-छः गोलियाँ भी कोई परिणाम नहीं दे पा रहीं थीं। खाँसी, खराश और कमज़ोरी का प्रकोप अपने तीव्रतम स्तर पर था। हर चार घन्टे में ऑक्सीजन का लेवल नापना और बुखार लेना; बस यही दो काम रह गये थे। कोई सुध-बुध न थी। माथा छू-छू कर दिन-रात उसकी तपन का अनुमान किया करते थे। पढ़ना-पढ़ाना, सुनना-सुनाना तो दूर, किसी बात का होश नहीं था। इस बीच एक दिन मेरा ऑक्सीजन लेवल ८६-८७ के आस-पास आ गया। पिता जी एवं पत्नी भी कोरोना से पीड़ित थे, लिहाज़ा ऑक्सीजन के सिलिंडर की व्यवस्था पहले से घर पर थी। ऑक्सीजन लगा कर मुझे कुछ राहत दी गयी और इस बीच मैं एक अस्पताल का चक्कर भी लगा आया परन्तु वहाँ की अव्यवस्था के कारण तत्काल ही अपने घर वापस लौट आया। चेस्ट का स्कैन कराया। स्कोर दस निकला। मन घबरा गया। तत्काल स्टेरॉयड आरम्भ किये गये। एंटी-वायरल शुरू की गयी। विटामिन्स पर विशेष ध्यान दिया गया। तबियत धीरे-धीरे स्थिर होने लगी। मन को बस एक ही संबल था और वह संबल था मेरे श्री राम का।
मुझे गुरु वशिष्ठ द्वारा श्री राम को वन हेतु विदा करने के समय का दृश्य स्मृति में उभर आया जब उन्होंने श्री राम से कहा था कि वन में तुम्हारी सजगता तुम्हारे वन-प्रवास की सफलता का कारण बनेगी। वन के अन्धकार का ज्ञान तुम्हारे अंतःकरण में ज्योति जगने का कारण बनना चाहिये। वन के रहस्य से सामंजस्य की स्थापना समस्त वन-प्रदेश को तुम्हारे अधीन कर देगी। इन वाक्यों के स्मृति में आते ही मुझमें एक नवीन ऊर्जा का संचार हुआ। ज्ञान ही मुक्ति का आधार है। वह जीवन का कोई भी क्षेत्र हो, आपकी विषय के साथ सम्बन्ध-स्थापना और उसके रहस्य को आत्मसात करने की योग्यता आपके प्रत्येक संघर्ष को निर्णायक रूप से आपके पक्ष में कर देती है। मैंने बीमारी के प्रति अपनी जागरूकता को बढ़ाया और आश्चर्यजनक रूप से स्वयं में अनेक परिवर्तन अनुभव करने लगा। मैंने अनुभव किया कि मैं औचित्यहीन बातों के लिये व्यर्थ ही परेशान था। इस तथ्य ने मुझे आने वाले दिनों को देखने की दृष्टि प्रदान की और मैं स्वयं को मानसिक रूप से उनका सामना करने हेतु तत्पर कर सका। शनैः-शनैः बुखार उतरा, खाँसी कम हुयी और खराश जाने लगी। मैंने स्वयं को स्वस्थ होता अनुभव किया और इस बात ने मुझे अत्यंत संतोष की अनुभूति प्रदान करी। निश्चय ही यह एक नव-जीवन की प्राप्ति थी। वास्तव में मैंने प्रभु श्री राम के कृपाशीष अभिसिंचित एक नया जीवन प्राप्त किया था।
वन में जिस प्रकार श्री राम प्रति दिन वन के एक नवीन तथ्य से साक्षात्कार कर उसे आत्मसात करते थे, उसी प्रेरणा से मैंने भी स्वयं को स्वस्थचित्त रखते हुये अपनी तैय्यारी आरम्भ की। मैंने अनुभव किया कि कमज़ोरी मुझे बुरी तरह से घेरने वाली है। उठना-बैठना मुश्किल होने वाला है। साधारण दिनचर्या के कर्म भी मुझे थका देने के लिये पर्याप्त होंगे। यह समय आहार और खान-पान के प्रति पूर्ण सजगता बरतने का है। मैंने इस पक्ष पर विशेष ध्यान देना आरम्भ किया तथा साथ ही फ़ूड-सप्लीमेंट्स भी लेने शुरू कर दिये। मैंने प्राणायाम और हल्के-फुल्के व्यायाम करना आरम्भ किया। मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य हेतु थोड़ा-बहुत ध्यान लगाने की चेष्टा करी। परिणामतः, कमज़ोरी तो अवश्य रही परन्तु श्री राम की प्रेरणा-शक्ति ने इस कमज़ोरी को मेरे ऊपर हावी नहीं होने दिया और यह समय मैं अपेक्षाकृत अधिक सहजता और सरलता से व्यतीत कर रहा हूँ।
आज यदि मैं आपके साथ अपने अनुभव साझा कर पा रहा हूँ तो निश्चय ही यह श्री राम के चरित्र से प्राप्त उस प्रोत्साहन का परिणाम है जिसने मुझे इस कठिन काल में प्रेरणाचालित रखा और मेरे मन को अतिशय संबल प्रदान किया। मैं जीवन में जितना भी गहरे देखने के प्रयत्न करता हूँ, यही पाता हूँ कि श्री राम का अद्भुत सर्वकालिक प्रासंगिक चरित्र असंख्य लोगों को प्रेरणा देने में सदैव सक्षम रहा है और सदा ही सक्षम रहेगा। उनके व्यक्तित्व के विभिन्न आयाम इतने विराट हैं कि जीवन का कोई भी पक्ष उनसे अछूता नहीं रह गया है; फिर चाहे वह राजनीती के सिद्धांत हों, धर्म की मीमांसा हो, जीवन-दर्शन का ज्ञान हो या मेरे जैसे व्यक्ति के लिये अपनी बीमारी में उनसे प्रेरणा प्राप्त करने की छोटी सी बात ही क्यों न हो? मैंने विचार किया कि श्री राम की प्रेरणा-शक्ति से चालित हो कर यदि मैं किसी एक व्यक्ति के जीवन को कुछ सहायता दे सकूँ या किसी एक व्यक्ति के लिये भी संबल बन सकूँ अथवा किसी एक व्यक्ति के जीवन में कुछ परिवर्तन ला सकूँ या फिर किसी एक व्यक्ति के जीवन में तिनके जितना सहारा भी बन सकूँ तो यह मेरे लिये बहुत बड़ी उपलब्धि होगी और यही वह कारण है जिसके चलते मैंने यह आलेख आप लोगों के साथ साझा करने का संकल्प किया। आप लोगों में से यदि कोई एक व्यक्ति भी मेरे इस अनुभव से लाभ उठा सके तो मैं अपने इस प्रयास को सफल समझूँगा। प्रभु श्री राम की शक्ति के सम्मुख मैं अवनत-शीश हो उन्हें नमन करता हूँ। जय श्री राम।




I am aware of the methodical way in which findings are expressed. The analytical distinction between interpretation and fact is preserved. The website offers further contextual mapping on this topic. The breadth of analysis is expanded by platform-based entertainment ecosystems.